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भोगीलाल लहेरचन्द प्राच्यविद्या संस्थान में प्राकृत भाषा एवं साहित्य की 21 दिवसीय 23वीं पाठ्यशाला

इस वर्ष राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान के साथ मिलकर भोगीलाल लहेरचन्द प्राच्यविद्या संस्थान ने प्राकृत भाषा एवं साहित्य की 21 दिवसीय पाठ्यशाला का 23वाँ आयोजन 8 मई से 29 मई तक किया  । विगत 22 वर्षों से बिना किसी व्यवधान के  संस्थान इस समर स्कूल का आयोजन कर रहा है । इस पाठ्यशाला में 17 विद्यार्थियों ने सफलता पूर्वक प्रारम्भिक स्तर पर अध्ययन के लिये पाठ्यक्रम को पूरा किया और प्रमाणपत्र प्राप्त किए । पाठ्यशाला का आरम्भ दिल्ली वि.विद्यालय के पूर्व डीन ऑफ कॉलेजेज डा. एस.एस.राणा के सभापतित्व में प्रो. सत्यरंजन बैनर्जी के उद्घाटन अभिभाषण के साथ 8 मई को हुआ । कलकत्ता विश्वविद्यालय से अवकाश-प्राप्त प्रो. बैनर्जी प्राकृत भाषा एवं साहित्य के मूर्धन्य विद्वान हैं । प्रो. बैनर्जी ने प्राकृत व्याकरण पर हेमचन्द्र के शब्दानुशासन की शैली में आज के विद्यार्थियों के लिये अत्यन्त उपयोगी प्राकृत व्याकरण प्रवेशिका की रचना की है । प्राकृत भाषा के अध्यापन की कई विधियां हो सकती हैं । बीएलआईआई में व्याकरण-मूलक विधि अपनाई जाती है । इस विधि से जो विद्यार्थी प्राकृत सीखते हैं उनका प्राकृत-ज्ञान सामान्य न होकर विशिष्ट होता है । पुस्तकों में जो प्राकृत की संस्कृत छाया दी जाती है उसका संशोधन भी हमारे विद्यार्थी कर सकते हैं ।  वे व्याकरण की सहायता से शिक्षित होने के कारण महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी और अर्ध-मागधी प्राकृत की पहचान सरलता से कर लेते हैं । इन्हीं प्राकृत भाषाओं के चुनीन्दा संदर्भों का एक संग्रह प्रो. बैनर्जी की देखरेख में तैयार किया गया है । इसी को आधार बनाकर इस पाठ्यशाला में अध्यापन किया जाता है । इस वर्ष प्रो. बैनर्जी के अतिरिक्त कलकता की डा. अनीता बन्दोपाध्याय, लाडनू में प्राकृत के प्रो. जगतराम भट्टाचार्य, अहमदाबाद में प्राकृत एवं संस्कृत के प्रा. डा. दीनानाथ शर्मा, जयपुर में रा.सं.संस्थान में प्राकृत प्राध्यापक डा. कमलेश जैन, लाडनू में ही प्राकृत के अध्यापक डा. दामोदर शास्त्री और पूना के भण्डारकर इन्स्टीट्यूट में प्राकृत कोश के कार्य में संलग्न डा. कमल कुमार जैन ने भाग लिया । सभी विद्यार्थियों और अध्यापकों को इन दिनों परिसर में ही रहना आवश्यक होता है। प्रातः 9-30 से रात के 9 बजे तक भोजनावकाश को छोड कर लगातार काम होता है । प्रतिदिन छह घण्टे अध्यापन और शेष समय में छात्र, अध्यापकों के साथ बैठ कर, अभ्यास करते हैं । इस सघन पढाई का ही परिणाम है कि जो विद्यार्थी पहले से ही प्राकृत में एम.ए करके आते हैं वे भी यहां आकर ही प्राकृत सीख पाते हैं ।

29 मई को समापन समारोह हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. मिथिलेश चतुर्वेदी ने समारोह की अध्यक्षता की तथा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने समापन भाषण दिया। रा. संस्कृत संस्थान के कुल-सचिव डा. के.बी.सुब्बारायुडु समारोह में विशिष्ट अतिथि रहे । डा. सुब्बारायुडु ने संस्थान में अपनाई गई पाठ्य-पद्धति की प्रशंसा करते हुए रा.सं.संस्थान के सहयोग का आश्वासन दिया और प्राकृत-अध्ययन को सुदृढ करने की आवश्यकता पर जोर दिया । प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने समापन भाषण में कहा कि प्राकृत और संस्कृत सदा से समानान्तर रहकर प्रचलित रही हैं । शब्दों का परस्पर आदान प्रदान भी सहज रूप से होता रहा है । सभी संस्कृत नाटकों में दोनों भाषाओं का प्रयोग सामान्य बात रही है । आज भी संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन में लगे लोग जैसे संस्कृत समझते हैं वैसे ही सहज भाव से प्राकृत समझते हैं । वस्तुतः प्राकृत के बिना संस्कृत साहित्य का काम चल ही नहीं सकता । प्राकृत के बिना संस्कृत साहित्य एकांगी है । यह प्रश्न अलग से शोध का विषय हो सकता है कि संस्कृत से प्राकृत पनपी अथवा प्राकृत से संस्कृत । दोनों भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन की सुविधा का होना आवश्यक है । प्राकृत साहित्य में रस भरा पडा है । अध्येताओं को सूखी बहस में न उलझ का रसाप्लावित प्राकृत साहित्य का आनन्द लेना चाहिये । त्रिपाठी जी ने गाथा सप्तशती से कई प्राकृत गाथाओं को सुना कर अपने कथन की पुष्टि की । समारोह के अध्यक्ष प्रो. मिथिलेश चतुर्वेदी ने भाषा और बोली में व्याकरण द्वारा प्रतिपादित संस्कार की प्रक्रिया को उजागर किया । उन्होंने कहा कि प्राकृत भाषा को महत्व देने का एक सरल उपाय यह है कि संस्कृत नाटकों में जो प्राकृत के संवाद हैं उन्हें प्राकृत में ही पढाया जाये । आज सर्वत्र इन संवादों को संस्कृत छाया से पढाया जाता है । इससे प्राकृत की उपेक्षा होती है । प्राकृत के प्रति इस उपेक्षित व्यवहार को छोड दिया जाए तो पाठ्यशालाओं का आयोजन और भी अधिक सार्थक हो सकेगा ।

अन्त में कुलपति प्रो. त्रिपाठी जी ने अध्येताओं को पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र दिये । जोधपुर से आई डा. श्वेता जैन ने प्रथम, मध्यप्रदेश के धन्यकुमार जैन ने द्वितीय तथा रा.सं. संस्थान के भोपाल परिसर के राहुल जोशी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया । 2100 रु का प्रथम पुरस्कार जस्वन्ता धर्मार्थ ट्रस्ट तथा 1500, 1000 रु के द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार एन.के. फाऊंडेशन की ओर से दिये जाते हैं । समारोह में विद्यार्थियों ने पाठ्यशाला के विषय में अपनी प्रतिक्रिया प्राकृत भाषा में ही अभिव्यक्त की । यह भी विचार बना कि रा.सं.संस्थान प्राकृत के अध्यापन के लिये एक सुनिश्चित पाठ्यसामग्री तथा पाठ-विधि विकसित की जाए, जिससे विभिन्न केन्द्रों में जो प्राकृत के पाठ्यक्रम चल रहे हैं उनमें एकरूपता लाई जा सके और उनके स्तर को ऊंचा किया जा सके । बीएलआईआई इस योजना में रा. सं. संस्थान का सहयोगी हो सकता है ।

जे.पी. विद्यालंकार (संयोजक, पाठ्यशाला)

 
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